क्या अब ई-वे बिल व्यवस्था की समीक्षा का समय आ गया है?
वस्तु एवं सेवा कर (GST) के अंतर्गत अप्रैल 2018 से लागू ई-वे बिल प्रणाली का उद्देश्य कर चोरी पर रोक लगाना और माल की आवाजाही को पारदर्शी बनाना था। प्रारंभिक वर्षों में इस व्यवस्था ने अपनी उपयोगिता सिद्ध की, लेकिन आज के डिजिटल युग में यही व्यवस्था ईमानदार उद्योगों एवं व्यापारियों के लिए अनेक व्यावहारिक कठिनाइयों का कारण बनती जा रही है।
जमीनी हकीकत यह है कि मामूली लिपिकीय त्रुटियों, वाहन संख्या के एक अंक की भूल, पिन कोड या दस्तावेज संख्या की छोटी चूक पर वाहनों को घंटों या कई-कई दिनों तक रोक लिया जाता है। धारा 129 के अंतर्गत कर की 200% तक पेनाल्टी लगाई जाती है, जबकि कर चोरी की कोई मंशा सिद्ध नहीं होती। समय पर माल न पहुँचने से उद्योगों को आर्थिक नुकसान, ऑर्डर रद्द होने और व्यापारिक प्रतिष्ठा की क्षति का सामना करना पड़ता है।
विवश होकर व्यापारी केवल माल छुड़ाने के लिए भारी पेनाल्टी जमा कर देते हैं। आगे अपील करने के लिए भी पेनाल्टी का 25% पूर्व-जमा करना पड़ता है और अपीलें वर्षों तक लंबित रहती हैं। कई मामलों में तो जब्ती के आदेश (MOV-09) जारी ही नहीं किए जाते या बिना कारण बताए यांत्रिक आदेश थमा दिए जाते हैं।
इस व्यवस्था का सबसे भारी व्यावहारिक बोझ ट्रांसपोर्टरों पर पड़ता है, जबकि कानून बनाते समय इस वर्ग की जमीनी परिस्थितियों की अनदेखी की गई है। रास्ते में गाड़ी खराब हो जाती है, माल दूसरे वाहन में पलटना (Transshipment) पड़ता है, ड्राइवर बदलना पड़ता है, या ट्रैफिक जाम एवं अन्य अपरिहार्य कारणों से यात्रा लंबी खिंच जाती है और ई-वे बिल रास्ते में ही Expire हो जाता है।
नियमानुसार वैधता समाप्ति के केवल 8 घंटे पहले से 8 घंटे बाद तक ही अवधि-विस्तार संभव है। अधिकांश ट्रांसपोर्टर और ड्राइवर कम पढ़े-लिखे होते हैं। उनसे यह अपेक्षा करना कि वे उसी समय पोर्टल पर ई-वे बिल Extend करें या नया बनवाएं, व्यावहारिक नहीं है। परिणाम यह होता है कि जहाँ कर पूरा चुकाया जा चुका है और चोरी की कोई मंशा नहीं, वहाँ केवल तकनीकी समय-सीमा चूकने पर माल जब्त कर भारी पेनाल्टी लगा दी जाती है।
विडंबना यह है कि सरकार का अपना परिपत्र संख्या 64/38/2018 दिनांक 14.09.2018 स्पष्ट कहता है कि मामूली त्रुटियों जैसे वर्तनी की भूल या वाहन संख्या में एक-दो अंकों की त्रुटि पर माल जब्त न कर केवल ₹1,000 का सांकेतिक जुर्माना लगाया जाए। किंतु फील्ड स्तर पर इस परिपत्र की व्यापक अनदेखी हो रही है और हर छोटी चूक को कर चोरी मानकर कार्रवाई की जा रही है।
आज सरकार के पास ई-इनवॉइस (₹5 करोड़ से अधिक टर्नओवर पर अनिवार्य), GSTR-1 व GSTR-2B का स्वतः मिलान, FASTag/RFID से एकीकृत ई-वे बिल ट्रैकिंग, GPS, टोल डेटा और डेटा एनालिटिक्स जैसी आधुनिक डिजिटल व्यवस्थाएँ उपलब्ध हैं, जिनसे माल की आवाजाही और लेन-देन की प्रभावी निगरानी बिना वाहन रोके संभव है।
जिस लेन-देन का इनवॉइस सरकारी पोर्टल पर पहले ही दर्ज हो चुका है, उसी माल को सड़क पर रोककर दोबारा जांचना दोहराव मात्र है। हजारों अधिकारियों को सड़क पर मैनुअल जांच में लगाने के बजाय तकनीक आधारित, जोखिम-आधारित (Risk-Based) निगरानी प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है। यदि किसी लेन-देन पर संदेह हो, तो उसका परीक्षण संबंधित करदाता के क्षेत्राधिकार वाले GST अधिकारी द्वारा किया जा सकता है; वाहन और माल की आवाजाही को बाधित करना आवश्यक नहीं।
COBI के प्रमुख सुझाव
- ई-वे बिल व्यवस्था की व्यापक समीक्षा हो। जिन B2B लेन-देन का ई-इनवॉइस पहले ही जारी हो चुका है, उन्हें चरणबद्ध रूप से ई-वे बिल की अनिवार्यता से मुक्त किया जाए।
- वाहन रोकने की कार्रवाई केवल डेटा-आधारित जोखिम संकेतों पर हो। रैंडम या लक्ष्य-आधारित जांच बंद हो।
- मामूली त्रुटियों पर परिपत्र 64/38/2018 का कड़ाई से पालन सुनिश्चित हो। जब्ती नहीं, केवल सांकेतिक जुर्माना लगाया जाए।
- प्रत्येक जब्ती में तर्कसंगत एवं कारणयुक्त आदेश (MOV-09) अनिवार्य हो तथा माल की समयबद्ध रिहाई सुनिश्चित की जाए।
- ई-वे बिल संबंधी अपीलों का निपटान 60–90 दिनों की निर्धारित समय-सीमा में हो।
- अवधि-विस्तार की 8 घंटे की सीमा बढ़ाकर कम-से-कम 72 घंटे की जाए तथा गाड़ी खराब होने, ट्रांसशिपमेंट, ड्राइवर बदलने या जाम जैसे वास्तविक कारणों पर बिना पेनाल्टी विस्तार/पुनः जारी करने की सरल सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
- अपीलीय स्तर पर निरस्त होने वाली जब्तियों के आधार पर अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
कॉन्फेडरेशन ऑफ बहादुरगढ़ इंडस्ट्रीज (COBI) का मानना है कि अब समय आ गया है कि ई-वे बिल व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की जाए। यदि इसे पूर्णतः समाप्त करना तत्काल संभव न हो, तो कम-से-कम ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए जिसमें ईमानदार करदाता को अनावश्यक उत्पीड़न का सामना न करना पड़े, उद्योगों की सप्लाई चेन बाधित न हो और कर अनुपालन तकनीक के माध्यम से सुनिश्चित हो।
GST 2.0 सुधारों की दिशा में बढ़ते हुए ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस’ तभी सार्थक होगा, जब कानून कर चोरी पर प्रभावी नियंत्रण के साथ-साथ ईमानदार व्यापारियों के लिए सरल, पारदर्शी और विश्वास-आधारित व्यवस्था भी प्रदान करे।
अशोक कुमार मित्तल
कोषाध्यक्ष, कॉन्फेडरेशन ऑफ बहादुरगढ़ इंडस्ट्रीज (COBI)
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